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रामराज्य यात्रा प्रतिवेदन संवत् २०७७

रामराज्य यात्रा संवत् २०७७

प्रतिवेदन प्रपत्र

उद्देश्य-

भारत के द्वारा विश्व को राज्य के उस संकल्पना का साकार परिचय अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र द्वारा अपने कृतित्व व राज्य प्रणाली से कराया गया, जहाँ किसी को किसी प्रकार का दुख, नहीं था, अकाल मृत्यु नहीं था, चोरों लुटेरों का भय नहीं था, आग, बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदाओं का भय नहीं था, राजा(सरकार) प्रजा की शोषक नहीं अपितु पोषक होती थी, मौसम और पर्यावरण सभी अनुकूल रहते थे इत्यादि बहुत से अद्भुत गुण विद्यमान थे।

 

इन्हीं गुणों के विषय में जन-जन में पुनः जागृति करके विश्व कल्याण की कामना से रामराज्य प्रशासन द्वारा शास्त्रों में वर्णित राजा रामचंद्र जी के राज्य व्यवस्था के अनुकूल शासन/प्रशासन का जागरण, शोध, शिक्षण, प्रशिक्षण, यात्रा करना और रामराज्य की संकल्पना को साकार करना है।

 

प्रस्तावना

रामराज्य के विस्तार व प्रचार प्रसार का कार्य भारत के सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है, जब भी शासन व सत्ता और प्रजा के बीच कल्याणकारी समन्वय न्यून हो जाता है, तब-तब इसकी पुनः स्थापना के लिए रामायण के विभिन्न संस्करणों के विस्तार से रामराज्य के कल्याणकारी समन्वय को पुनः स्थापित करने का प्रयास होता रहा है।

श्री रामजन्म भूमि पर भव्य राममंदिर को स्थापित करने वाले राजा विक्रमदित्य से लेकर भारत के भव्य विस्तार से लेकर, मंदिर के पुनः ध्वंश होने तक, भक्ति आंदोलन द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं में रामायण के गठन द्वारा राम के सगुण स्वरूप का विस्तार। वहीं कबीरदास के माध्यम से राम के निर्गुण स्वरूप का विस्तार करके श्री राम की प्रजा को विपरीत व विधर्मी शासनकाल में संरक्षण व समन्वय की एक लंबी परिपाटी रही है। इसी परिपाटी में श्री रामजन्म भूमि पर पुनः मंदिर निर्माण रामराज्य के विस्तार की घोषणा करते प्रतीत हो रहा है।

ऐसे समय में रामराज्य प्रशासन जो कि श्री राजा रामचन्द्र जी के प्रेरणा से ही कार्य कर रहा है, द्वारा पहली बार अयोध्यापुरी से बाहर जाकर प्रजा के बीच श्री रामराज्य सभा के सञ्चालन का संकल्प लिया गया जो कि पहले केवल अयोध्या में आयोजित होता रहा है।

इस यात्रा के माध्यम से प्राप्त अनुभवों के आधार पर रामराज्य के लिए उपयुक्त विचारों से समाज, सरकार और अन्य व्यवस्थाओं को सूचित करना और रामराज्य के प्रशासन को और सक्षम बनाना ही प्रस्तावित है।

यह प्रस्तावना विश्व व्यापी हो सके इसके लिए आगे भी प्रयास करते रहने के सामर्थ्य और आशीर्वाद सभी से अपेक्षित है।

राजा रामचन्द्र की जय

श्री रामराज्य स्त्रोत

आञ्जनेयपतिराजाराघवाय नमः,

रामराज्यकोषमवतु प्रभो! कुरु रक्षासमृद्धिम् वैभववृद्धिम्

प्रजाभि: करं दीयऽतेत:, तापत्रयम् नाशय तेषां,

रामराज्यप्रशासकभाष्करस्य, वचनमिदं कुरु सिद्धम् !

प्रजा त्वं शपथं। जयतां रामराज्य:।

इति रामराज्य स्त्रोतः

रामराज्य सभा संवत् २०७७

प्रत्येक वर्ष की अक्षय तृतीया को श्री रामराज्य सभा का आयोजन रामराज्य की राजधानी अयोध्यापुरी में होता रहा है, परंतु सम्पूर्ण विश्व में कोरोना नामक महामारी ने इस वर्ष के अक्षय तृतीया को यह आयोजन होने में बाधा उत्पन्न कर दी।

इस बाधा के शेष होते ही रामराज्य प्रशासन द्वारा यह विचार किया गया कि इस संवत् की श्री रामराज्य सभा का आयोजन बसंत पंचमी को होगा और इसका समापन माघ पूर्णिमा को किया जाएगा। इस वर्ष की श्री रामराज्य सभा पहली बार अयोध्यापुरी से बाहर भी लगाई जाएगी क्योंकि श्री रामलला जन्मभूमि की मुक्ति का कार्य पूर्ण हो चुका है और राजा श्री रामचन्द्र जी समेत अयोध्या अपने वैभव को पुनः प्राप्त होने की ओर अग्रसर है।

इसी कारण श्री रामराज्य प्रशासन ने यह निर्णय लिया कि श्री रामराज्य यात्रा के माध्यम से राजा श्री रामचन्द्र की राजधानी अयोध्यापुरी से होकर मार्ग के विभिन्न जनपदों से होते हुए यह यात्रा राजा भरत के द्वारा स्थापित भारतवर्ष की वर्तमान राजधानी दिल्ली में पूर्ण होगी।

यात्रा में जहाँ-जहाँ संभव हो सकेगा वहाँ-वहाँ श्री रामराज्य सभा का भी आयोजन किया जाएगा। इस राज्य सभा के माध्यम से रामराज्य प्रशासन यह ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करेगा कि राजा श्री रामचन्द्र जी की प्रजा की वास्तविक स्थिति क्या है और उसके द्वारा राजा श्री रामचन्द्र जी के राज्य शासन से क्या अपेक्षा है? इन अपेक्षाओं को पूर्ण करने हेतु प्रजा क्या दिशा निर्दिष्ट करती है इत्यादि।

ग्यारह दिवसीय यह यात्रा श्री अयोध्यापुरी से माता सरयू के पूजन से प्रारंभ हुई, फिर श्री रामलाल के दर्शन के पश्चात श्री रामराज्य सभा का प्रथम आयोजन वशिष्ठ पीठ के पीठाधीश्वर पूज्य गिरीशपति त्रिपाठी के आशीर्वाद से अयोध्या में पूर्ण हुआ और इसी प्रकार क्रमशः बस्ती, अंबेडकर नगर, आजमगढ़, शाहगंज, सुल्तानपुर, अमेठी, रायबरेली, कौशांबी, कानपुर, इटावा, ग्रेटर नोएडा से होते हुए अंततः भारत वर्ष की राजधानी स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस पर सम्पूर्ण हुई।

इस सम्पूर्ण यात्रा को राष्ट्रीय सामाजिक समरसता संगठन, नई दिल्ली, अखिल भारतीय गौ सेवक समाज, नई दिल्ली तथा रुद्रा इंटरनेशनल स्कूल मीरजापुर, उत्तरप्रदेश का सहयोग प्राप्त था, इसके अतिरिक्त अयोध्या स्थित दर्शन भवन, छोटी छावनी की महान्त डॉ ममता शास्त्री जी और वशिष्ठ पीठाधीश्वर का आशीर्वाद इस पूरे आयोजन हेतु प्राप्त होता रहा।

इस आयोजन को भारत सरकार के गृह मंत्रालय के ओर से पुरी सुरक्षा, राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय के माध्यम से प्राप्त हुई। वहीं उत्तरप्रदेश सरकार के द्वारा भी पूरे यात्रा मार्ग को निष्कंटक करने हेतु सुरक्षा व गुप्तचर अनुभाग का सहयोग सक्रिय रूप से प्राप्त होता रहा। केवल इटावा जनपद में स्थानीय सुरक्षा तंत्र निष्क्रिय व गंभीरता विहीन प्रतीत हुआ, जिसके संबंध में गृह मंत्रालय भारत सरकार को अवगत करा दिया गया।

इस यात्रा के प्रभारी श्री श्रवण कुमार चौहान जी द्वारा पूरे यात्रा को कुशलतापुर्वक संचालित किया गया, यात्रा में पूरे समय रामायण सम्राट आर्षेय मोहनेन्द्र विश्वामित्र जी का आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, इसके अतिरिक्त अन्य बंधु भी यात्रा में सहयोग व समन्वय करते रहे।

श्री रामराज्य सभा संवत् २०७७ के विभिन्न सभाओं का स्थान

अयोध्यापुरी की सभा- (परम पूज्य गिरीशपति त्रिपाठी जी, श्री रवि तिवारी जी)

आयोजन की तिथि- बसंत पंचमी, संवत् २०७७ दिन मंगलवार

स्थान- वशिष्ठ पीठ, तिवारी मंदिर, अयोध्यापुरी

बस्ती जनपद की सभा – (श्री अनुपम श्रीवास्तव जी)

आयोजन की तिथि – माघ शुक्ल षष्ठी, संवत् २०७७ दिन बुधवार

स्थान- सिटी मांटेसरी स्कूल पिकौरा, बस्ती

अंबेडकर नगर की सभा- टांडा, अंबेडकर नगर। (श्री नीरज श्रीवास्तव, श्री श्याम बाबू गुप्ता)

आयोजन की तिथि – माघ शुक्ल षष्ठी, संवत् २०७७ दिन बुधवार

आजमगढ़ की राज्यसभा – बुढ़नपुर, परशुराम मंदिर, आजमगढ़ (प्रभारी श्री राकेश कुमार सिंह)

आयोजन की तिथि – माघ शुक्ल षष्ठी, संवत् २०७७ दिन गुरुवार

शाहगंज की राज्य सभा – (श्री पवन जी) स्थान-

आयोजन की तिथि – माघ शुक्ल षष्ठी, संवत् २०७७ दिन गुरुवार

सुल्तानपुर – (श्री कामता सिंह, श्री धर्मेन्द्र यादव, श्री पंकज उपाध्याय)

माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

अमेठी – (श्री कामता सिंह, श्री पंकज उपाध्याय)

माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

रायबरेली (श्री अविनाश शुक्ला जी, श्री अली हैदर जी)

माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

कौशांबी (डॉ निशीथ श्रीवास्तव जी) स्थान- सिराथु माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

कानपुर (श्री अमित त्रिपाठी जी) माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

इटावा (श्री संजय जी) माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

ग्रेटर नोएडा (श्री सुनील पाण्डेय जी) माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

दिल्ली माघ शुक्ल सप्तमी, संवत् २०७७ दिन शुक्रवार

 

कुल तेरह राज्यसभा का आयोजन हुआ, औरैया, आगरा और मथुरा में केवल संपर्क हुआ राज्यसभा का आयोजन अगले चरण में होगा।

रामराज्य यात्रा का प्रारंभ और समापन

रामराज्य यात्रा का प्रारंभ अयोध्यापुरी से होकर सड़क मार्ग से दिल्ली तक पहुँच कर समाप्त हुई। यह यात्रा बसंत पंचमी दिन मंगलवार से प्रारंभ हुई और माघ पूर्णिमा दिन शनिवार को समाप्त हुई।

यात्रा के प्रारंभ में माता सरयू जी का पूजन किया गया, फिर श्री रामजन्म भूमि मंदिर का दर्शन करके यात्रा के प्रथम पड़ाव अयोध्यापुरी में ही प्रथम राज्यसभा का आयोजन हुआ। इसके पश्चात अन्य पड़ावों पर भी राज्यसभा का आयोजन होता हुआ, यात्रा निरंतर आगे बढ़ते हुए अंततः भारत की राजधानी दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर पर समाप्त हुआ।

रामराज्य यात्रा का उद्देश्य एक ओर भारतवर्ष की वास्तविक स्थिति का आँकलन अयोध्या से बाहर निकलकर रामराज्य प्रशासन द्वारा प्रत्यक्ष रूप से करना और रामराज्य सभा के आयोजन से यह सुनिश्चित जानकारी प्राप्त करना था कि कितना रामराज्य रूपी तत्व समाज में शेष है और उसके कार्य व विचार क्षमता के अनुरूप अग्रिम कार्यपथ की दिशा क्या हो सकती है।

रामराज्य सभा का मत

रामराज्य के विषय में सभासदों द्वारा विभिन्न प्रकार के मत प्रकट किए गए, इस सभा में समाज के सभी वर्गों, समुदायों, का समावेश बिना किसी भेद भाव के हुआ, क्या स्त्री, क्या पुरुष, क्या बाल, क्या वृद्ध सभी ने अपने ज्ञान, विवेक, क्षमता, योग्यता व श्रद्धा के साथ अपने-अपने मत को प्रकट करते हुए रामराज्य के विषय में बातें बताते रहे, इन्हीं बातों का सारांश नीचे दिया जा रहा है-

रामराज्य एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ किसी का किसी से बैर भाव नहीं होता है, यदि किसी राज्य में नागरिक का आपस में बैर हो तो यह स्पष्ट है कि वह रामराज्य नहीं है। राजा रामचन्द्र जी के शासन काल में राज्य की नीतियाँ बहुत अच्छी होती थीं। रामराज्य में यह आवश्यक है कि सभी लोग अपने कर्तव्य और अधिकार को समझें और उसी के अनुसार काम करें। सभी अच्छी चीजें जब एक जगह एकत्रित हों तब रामराज्य होता है।

राजा व प्रजा का आपस कैसा होना चाहिए? वास्तव में रामराज्य राजा व प्रजा में ऐसा संबंध होना चाहिए जैसे पिता और पुत्र का आपस में संबंध होता है। राजा को एक अच्छा श्रोता होना चाहिए जिससे वह प्रजा के असंतुष्टि को ज्ञात कर सके और उसे संतुष्ट करने का प्रयास करे। असली राजा वही है प्रजा के असन्तुष्ट रहने तक स्वयं भी असन्तुष्ट रहे।

राजा रामचन्द्र का एम.आई.एस. अर्थात सूचना तंत्र बहुत ही अच्छा है, जब जिसकी आवश्यकता होती तब वह उपलब्ध करा देते हैं।  रामराज्य का अर्थ है प्रजा का कल्याण करना, राजा को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एक ही पिता के पुत्रों के गुण व शील अलग-अलग होते हैं अतः इस आधार पर उनके बीच किसी प्रकार का भेद-भाव न होने पाए।  रामराज्य में बड़े और छोटे भाव नहीं होना चाहिए, प्रजा में आपस में बैर भाव नहीं होना चाहिए। द्वेष भाव को रामराज्य में स्थान नहीं हो सकता है। राजा का जनता के प्रति कैसा व्यवहार हो? यह रामराज्य में बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।

केवल श्री राम के लिए काम न हो, रामराज्य के लिए भी काम होना चाहिए। रामराज्य में कोई भी गरीब और अमीर नहीं होता है, सभी बराबर होते हैं। आजकल मौज-मस्ती को, कामचोरी और आलस्य को रामराज्य से तुलना किया जाता है, जो कि गलत है, ऐसा नहीं होना चाहिए। दुनिया में एक मात्र भारत ही है जो कि विश्व कल्याण की कामना करता है, इसके लिए भारत में पहली बार रामराज्य यात्रा के माध्यम से रामराज्य सभा लगाई जा रही है। यह गौरवपूर्ण यात्रा निकल रही है, इसके माध्यम से सबको माला की तरह एकत्रित करना चाहिए। रामराज्य सभा का आयोजन प्रत्येक वर्ष होना चाहिए, प्रत्येक राज्य और देश से आकार अयोध्या में राज्य सभा होनी चाहिए। इस यात्रा और रामराज्य सभा की कल्पना और टीम का स्वागत है।

रामराज्य के अर्थ प्रणाली के विषय में बताते हुए तुलसीदास जी ने कहा है कि “वर्षत हर्षत सब लखै, कर्षत लगै न कोय” इसीलिए कहा गया है “रामराज्य बैठे त्रैलोका, हर्षित भए गए सब शोका”। रामराज्य में जो मांगा जाता है वह मिल जाता है। इस लिए हम लोगों को रामराज्य की संकल्पना को साकार करना चाहिए। रामराज्य पर अनुसंधान के माध्यम से अगली पीढ़ी को जोड़ना चाहिए और रामराज्य के समय का जो आर्थिक पक्ष था उसका व्यापक शोध होना चाहिए। रामराज्य के अनुरूप कोई माडल ग्राम स्थापित हो।

रामराज्य की राजधानी अयोध्या को भव्य बनाना चाहिए। रामराज्य और अखंड भारत जन-जन की मांग है। यह कार्यक्रम गाँव-गाँव तक पहुंचे। अयोध्या की मिट्टी व सरयू का जल राज्य सभा में अवश्य हो। राजा रामजी से आग्रह है कि भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का नाश करें। प्रजा को अपना राजा मिलकर चुनना चाहिए। हम सभी प्रजा जन इस राज्यसभा के माध्यम राजा रामजी से यह अर्जी लगाते हैं कि गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा मिले।

रामराज्य का विषय जब भी आएगा तो श्री रामकथा का भी वर्णन होगा इसी कड़ी में श्री रामकथा के विषय में भी राज्यसभा ने अपनी बात रखी। माता कैकेई को निर्दोष मानते हुए महर्षि भरद्वाज ने भरत जी को प्रेरित किया था। श्री रामचंद्र जी ने भी वनवास से वापस आने के पश्चात माता कैकेई और मंथरा का सम्मान किया था।

इसके बाद राज्यसभा ने सामान्य लोक परस्थितिजन्य समस्यों पर भी विचार रखते हुए बताया कि परिवार के टूटने की आज बहुत बड़ी समस्या समाज में उत्पन्न हुई है, इसके लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि पारिवारिक विवादों को आपस में ही सुलझाने का प्रयास हो और इसके लिए विशेष प्रकार की टोली बनाकर प्रयास करना चाहिए।

मांसाहार के अधिक बढ़ते प्रचलन पर भी सभा ने चिंता व्यक्त की और ऐसी व्यवस्था पर चर्चा किया जिससे की शाकाहार की ओर लोग प्रेरित हों। प्राचीन काल में लोग मांसाहार से दूर रहते थे जिसके कारण उनकी आयु भी लंबी होती थी और स्वास्थ्य भी ठीक रहता था। इसी प्रकार से शराब के सेवन संबंधी सभी प्रकार के प्रचार पर रोक लगाई जानी चाहिए।

समाज में कुरुतियों की चर्चा करते हुई बाल विवाह की घोर निन्दा की गई और इस पर रोक लगाने के लिए समाज को स्वतः सक्रिय होने के लिए आग्रह किया गया। एक पार्षद के द्वारा अपने ही विद्यालय के एक छात्रा के साथ हुई घटना का भी विस्तार से वर्णन किया गया। इसी प्रकार दहेज के कुरीति पर चर्चा करते हुए सभा ने चिंता व्यक्त की और इसके कारण होने वाली हत्याओं की चर्चा करते हुए उत्तर प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल के उस कार्य की भी चर्चा की गई जिसमें इस प्रकार के सजा प्राप्त अपराधियों को उन्होंने सुधार/बंदी गृह से मुक्त कराके एक सराहनीय कार्य किया और पश्चाताप करने का उन्हें अवसर प्रदान किया।

समाज में भाई से भाई का अलगाव एक चिंता जनक स्थिति है इसपर भी सभा ने चर्चा की और स्वधर्म पर चलने, वैदिक परंपराओं को लोप होने से बचाने के प्रयास पर मत प्रकट किए गए। रामायण में उल्लेखित इस विषय को भी प्रकट किया गया कि जहाँ सुमति वहाँ संपत्ति नाना, जहाँ कुमति वहाँ विपत्ति निदाना। इसलिए परिवार में भाई-भाई में सुमति होनी चाहिए। इसी का उदाहरण राज्य सभा को सुल्तानपुर में देखने को प्राप्त हुआ जहाँ के सभा के आयोजक के परिवार में चार भाई आपस में मिलकर सुमति से रहते और परिवार को सुखी और समृद्ध कर रहे थे। सभा ने इन चारों भाइयों की एकता बनी रहे इसकी कामना की।

अयोध्या की विशेष चर्चा करते हुए सभा ने अयोध्या में महत्व और वैभव की अनुरूप ही वहाँ के नागरिक तुल्य बंदरों के लिए एक विशेष अभ्यारण की व्यवस्था का सरकार से और स्थानीय प्रशासन से किया और बंदरों के साथ ही साथ अन्य पशु-पक्षियों के लिए भी अयोध्या में विशेष अभ्यारण की व्यवस्था होनी चाहिए ऐसा मत प्रकट किया। साथ ही अयोध्या में अन्तराष्ट्रिय स्तर के एक केन्द्रीय विश्वविध्यालय की भी कामना की गई जो गुरु वशिष्ठ के नाम पर स्थापित हो, इसी प्रकार का मत २००५ में भी संस्कृत के विद्वानों द्वारा प्रकट किया गया था परंतु तब बात आगे नहीं बढ़ सकी थी।

रामराज्य सभा ने गाय की दुर्दशा पर चिंता करते हुए अपने विचार रखे और इस बात पर चिंता व्यक्त की, कि गाय धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। नेपाल सरकार गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित कर चुका है। संविधान पूर्ण रूप से गौमात को राष्ट्रमाता घोषित करने का अधिकार देता है। गौरक्षा के संदर्भ में भारत सरकार को निर्देशन देने का अधिकार है। गौमाता की अवहेलना भी हार्दिक आघात पहुँचाता है। सरकार इसलिए गौ रक्षा के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि असुर समाज एक साथ मिलकर वोट देता है। गाय सम्पूर्ण विश्व की माता है। गोबर में लक्ष्मी का वास है। गाय को पशु नहीं अपितु राष्ट्रमाता घोषित किया जाना चाहिए, परंतु यह भी विचारणीय है कि राष्ट्रीय पक्षी मोर है परंतु उसकी भी दुर्दशा है। अतः समाज को भी अपने दायित्व को पूर्ण करने हेतु प्रयास करना चाहिए, सब कुछ सरकार के भरोसे नहीं संभव है। वही सरकार भारत सरकार है जो गो माता के लिए समर्पित है।

समाज में रामायण की बहुत व्यापकता है, विशेष करके धारावाहिक रामायण बार-बार देखने का मन करता है। राज्य सभा ने इस बात पर भी प्रसन्नता व्यक्त की कि कई पीढ़ियों बाद हमारे जीवन में श्री राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण हो रहा है, इस श्री रामजन्म भूमि का पाँच सौ वर्षों का संघर्षपूर्ण इतिहास है।

श्री रामचन्द्र जी ने कहा है कि जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है। यह संस्कार व संस्कृति बच्चों में कूट-कूट कर भरना चाहिए। हमें एक दूसरे कि किसी न किसी रूप में मदद करना चाहिए। भारत में देव संस्कृत भाषा अनिवार्य हो। प्रत्येक जिले की रामराज्य की कमिटी होनी चाहिए। यह कमिटी गाँव स्तर तक होनी चाहिए। राज्यसभा ने यह भी मांग की कि प्रत्येक ग्राम स्तर तक गोष्ठी व सत्संग करने हेतु नियुक्ति होनी चाहिए। जय श्री राम की सायं फेरी हो।

रामराज्य सभा ने गाँव-गाँव में ईसाई के द्वारा गरीबों के गरीबी का लाभ उठा कर किए जा रहे धर्मांतरण पर भी चिंता व्यक्त की। विशेष करके कौशांबी के आंतरिक गावों में धर्म परिवर्तन का विषय बहुत महत्वपूर्ण है। इस प्रकार के धर्मांतरण का एक कारण जन मानस में शिक्षा का अभाव भी है। हिन्दू धर्म का विषय अनिवार्य रूप से पढ़ाया सभी बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए।

कानपुर की राज्यसभा ने बताया कि बिठूर कानपुर में ही श्री वाल्मीकि जी का आश्रम है, इतना ही नहीं पृथ्वी का केंद्र बिन्दु जिसे ब्रम्हावर्त के नाम से जानते हैं वह भी बिठूर कानपुर में है। उजियारी देवी का मंदिर ख्योरा जिसका संबंध माता सीता जी से है भी कानपुर में ही है।

राज्य सभा ने श्री राम शब्द का वर्णन करते हुए बताया कि राम शब्दों से परे हैं, राम शब्द की महिमा अभय प्रदान करने वाली है। राम का नाम लेने वाले ही सज्जन व्यक्ति होते हैं। साथ ही राज्य सभा ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि आज कल श्री राम का नाम लेने वाले को भाजपाई समझा जाता है, जो कि उचित नहीं है। राम सत्य हैं और सत्य मरता नहीं और हम इसी सत्य के आधार पर विजय की ओर बढ़ रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्र की राज्य सभा ने कहा कि एक दूसरे की मदद करनी चाहिए न कि बुराई, गाँव का विकास हम सब आपस में मिलकर करें न कि सरकार या अन्य किसी के भरोसे। हमें सत्य मार्ग पर चलना चाहिए, सफाई, सत्य बोलना और मद्यनिषेध ये ग्रामीण विकास के लिए अनिवार्य है।

राज्य सभा ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि अर्थ की प्राप्ति और परिवार पालन ही सभी कर रहे हैं, जानवर भी यही कार्य कर रहे हैं। अतः हमारे और जानवर में कोई अंतर प्रतीत नहीं होता है। हमें मनुष्य बनने की आवश्यकता है। हम मिल कर नहीं रह सकते और एकजुट नहीं हैं और अपने को बुद्धिजीवी समझते हैं। यदि हम एक जुट होकर जीवन जीना नहीं सीखते हैं तो हम समाप्त हो जाएंगे।

राज्य सभा ने कुछ विषय पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त किया, एक ओर मद्यनिषेध के विभाग हैं वहीं दूसरी ओर सरकारी ठेके हैं। एक तरफ जातिवाद निषेध की बात है, दूसरी ओर जातियों के प्रमाणपत्र बनाते हैं।

राज्य सभा में उपस्थित वृद्ध जनों द्वारा बताया गया कि अथर्व वेद से अर्थ शास्त्र निकाला गया है अतः हमें वेदों का अध्ययन अनिवार्य रूप से करना चाहिए। हमें विचारों और कार्यों की शैली में मत भेद रखने की पुरी स्वतंत्रता है परंतु मन भेद कभी नहीं रखना चाहिए। वर्तमान में राजशाही, सामंत, लोकशाही से लोकतंत्र में हम सब रह रहे हैं अतः हमें आज के समाज, उस समय के समाज में क्या स्थिति थी इसका मूल्यांकन करना पड़ेगा। प्रबुद्ध लोगों को मार्ग निकालकर चर्चा करके सबको जोड़ने का कार्य करना चाहिए।

रामराज्य सभा ने सभा के आयोजन के माध्यम से आमजन को चेतना का कार्यक्रम के प्रयास की सराहना की। साथ ही यह भी इच्छा प्रकट की कि हमारे इष्ट के बारे में एक आम धारणा विचार प्रवाहित करने का प्रयास हो और इस प्रयास के जन-जन तक जाने का प्रयास हो।

श्री रामराज्य सभा संवत् २०७७ के माध्यम से उक्त कुछ बिन्दुयों का उल्लेख किया गया, उक्त भावना और मत के संक्षिप्त उद्धरण को गागर में सागर समझ कर स्वयं भी प्रेरित हों और अन्य बंधुओं को भी प्रेरित होकर रामराज्य के कार्य को करें। विषय में रामराज्य हो और सभी सुखी सम्पन्न और निरोगी हों।

राजा रामचन्द्र की जय।

रामराज्य कोष का पूजन

रामराज्य कोष राजा श्रीरामचन्द्र जी का राजकोष है, यह कोष उस प्राचीन और सनातन परंपरा का अंग है जिसका प्रारंभ अयोध्या से सर्वप्रथम राजा पृथु ने किया था। उसी परंपरा के निर्वाह के क्रम को बनाए रखने के लिए रामराज्य प्रशासन द्वारा रामराज्य कोष की पुनः स्थापना की गई।

भारतीय परंपरा में राजा के पास खाली हाथ जाने का निषेध है, इसलिए जब भी रामराज्य सभा का आयोजन होता है वहाँ राजा रामचन्द्र जी का राजकोष भी पूजित होता है। जिसके कारण सभा में उपस्थित पार्षद व अन्य बंधुओं द्वारा लाए गए उपहार इत्यादि को राजकोष में स्थान दिया जा सके।

रामराज्य कोष द्वारा प्रसाद के रूप में अमृतधारा का भी वितरण किया जाता है, जिससे प्रजा निरोगी और स्वस्थ रह सके।

रामराज्य प्रशासन

राजा और प्रजा के मध्य जो सेतु होता है उसे ही प्रशासन की संज्ञा दी गई है। यह प्रशासन राजा श्री रामचंद्र जी का प्रशासन है जो कि राजा रामचन्द्र जी के प्रजा के कल्याण हेतु कार्यरत है। इस प्रशासन के मुख्य प्रशासक के रूप में श्री भाष्कर सिंह हैं जिनके द्वारा अन्य प्रशासकों के माध्यम व सहयोग से रामराज्य के कार्य को गति प्रदान किया जाता है।

प्रतिवेदन का निहितार्थ

रामराज्य का कार्य सर्व कल्याण की भावना से किया जा रहा है, जिसमें समाज और सरकार दोनों का ही सहयोग है, इस सहयोग और समन्वय को भविष्य की कार्य प्रणाली और क्षमता को और अधिक विस्तृत करने के उद्देश्य से यह प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जा रहा है। जिससे इस पूरे प्रतिवेदन से समाज की स्थिति से सरकार अवगत हो सके और समाज भी सरकार के सहयोग के विषय में जानकारी प्राप्त कर सके। क्योंकि समाज और सरकार दोनों ही एक समानांतर व्यवस्था है और दोनों ही अनिवार्य और एक दूसरे पर निर्भर हैं। इसलिए इनका समन्वय होता रहे और दोनों एक दूसरे से लाभान्वित होते रहें यह इस प्रतिवेदन का निहितार्थ है।

उत्तरप्रदेश सरकार के लिए राज्यसभा का संदेश

उत्तर प्रदेश सरकार ने रामराज्य यात्रा की बहुत अच्छी तरह से सुरक्षा की चिंता की, रामराज्य यात्रा के यात्रा पड़ाव में लगने वाली सभी राज्यसभाओं में इस बात की प्रशंसा मुक्त कंठ से की गई।

राज्य सभा के तरफ से उत्तर प्रदेश को यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि अयोध्यापुरी के पुनः विकास में सनातन व पौराणिक आचार व्यवहार का विशेष ध्यान रखा जाए, अयोध्या के संत, अयोध्या के वानर, अयोध्या का आध्यात्म, अयोध्या का ज्ञान, अयोध्या की भाषा, रामायण इत्यादि का सूर्य के समान ही स्वयं भी प्रकाशमान हो और अन्य को भी प्रकाशित करता रहे।

अयोध्या में कोई ऐसा न हो जिसके पास अपना कोई काम न हो, कोई दरिद्र न हो, कोई रोगी न हो, कोई अपराधी न हो, कोई बिना आवास के न हो इत्यादि वैभवशाली अयोध्या का ध्यान रखने का संदेश।

पूरे प्रदेश को सरकार से अत्यधिक अपेक्षा है परंतु सरकार यदि समाज को इस बात के लिए भी प्रेरित कर सके की वह अपनी समस्याओं और आगे बढ़ने के मार्ग को स्वतः भी निर्माण करने में सक्षम हो तो सरकार व समाज की संयुक्त शक्ति प्रदेश को विश्व में एक अलग स्थान प्रदान कर सकती है।

भारत सरकार के लिए राज्य सभा संदेश

भारत सरकार के लिए राज्य सभा से यही संदेश है कि सरकार लंबे गुलामी के कालखंड से उपजे दोषपूर्ण सामाजिक भेदभाव मूलक व्यवस्था को जितना जल्दी हो सके निर्मूलन करने का नियमन करे। गरीबी संबंधी केवल योजनाओं से आगे बढ़ कर गरीबी को समाप्त करने के लिए सभी के लिए उत्पादन के कोई न कोई तकनीक से अवश्य संलग्न किया जाए और उत्पादन को विश्व स्तर पर खपत करने के प्रयास किया जाए।

भारतीय परंपरा के विश्व व्यापी स्वरूप को प्रस्तुत व विस्तृत किया जाए, संविधान के मूलभावना को विश्वभारती की ओर विस्तृत किया जाए, देश के जन-जन में वाणिज्य व सैन्य कर्म के प्रति लगन उत्पन्न करके अर्थ का उत्पादन और रक्षण करते हुए भारत का किरीट विश्वव्यापी किया जाए।

गौ, गीता, ग्राम, गुरुकुल और भारत के कुल को पुनः विस्तृति किया जाए। पूरे विश्व का भारतीयकरण ही विश्व कल्याण का कारक बने इसका प्रयास निरंतर बढ़ता रहे, यही संदेश है रामराज्य सभा का।

श्री रामजन्म भूमि तीर्थ न्यास से आग्रह

श्री रामजन्मभूमि के विगत ५०० वर्षों के आंदोलन के तप स्वरूप यह न्यास बन सका इसके लीये इस आंदोलन में अपनी आहुति देने वाले सभी रामभक्तों की आत्मा जहाँ भी होगी प्रसन्नता का अनुभव कर रही है।

श्री रामलला का भव्य मंदिर निर्माण सभी की अपेक्षा और आशा में है, विश्व हिन्दू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के संयुक्त नेतृत्व व पुरुषार्थ का यह अनुपम उदाहरण है जिनके कारण वर्तमान परिस्थिति और निर्णय हमारे समक्ष हमारे अनुकूल हो सका।

श्री राम की प्रजा और राम के महात्म्य को जानने वालों ने न्यास को भी पूर्ण समर्थन तन-मन-धन से दिया है और दे रहे हैं, यह आशा और विश्वास और बलवती होकर विश्व व्यापी हो इस बात की अपेक्षा न्यास से है।

भारत का जो धर्म विगत सदियों में लूटा गया है, वह पुनः स्थापित और जागृत हो इसका प्रयास न्यास द्वारा अग्रणी रूप से किए जाने की अपेक्षा है। क्योंकि अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे बड़े नेतृत्व कर्त्ता हैं। वह राजा हैं और राजा ही धर्म का प्रवर्तक होता है। इसिलए न्यास से अपेक्षा है कि वह धर्म को प्रवृत्त करने हेतु सभी घटकों को साथ लेकर कार्य करे।

आदि काव्य रामायण जो कि श्री राम का शब्द स्वरूप है, का विस्तार दुनिया के हर क्षेत्र में हो, कोई ऐसी आँख न हो जिससे अपने जीवित रहते श्री राम की लीला छूट जाए, कोई ऐसा कान न हो जो अपने जीवन में रामायण की कथा न सुन सके, कोई ऐसा मुख न हो जो श्री राम का गुणगान न करे। इस प्रकार के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए रामायण के सर्वभाषी व सर्वव्यापी स्वरूप को प्रारंभ करके संचालित करने की आवश्यकता है। यही छोटी सी अपेक्षा श्री रामजन्म भूमि तीर्थ न्यास से है।

जय श्री राम।

रामराज्य (अर्थात)

नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिस्सहितोऽनघ: ।
रामस्सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ।।1.1.89।।

प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्ट: पुष्टस्सुधार्मिक: ।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जित: ।।1.1.90।।

न पुत्रमरणं किञ्चिद्द्रक्ष्यन्ति पुरुषा: क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रता: ।।1.1.91।।

न चाग्निजं भयं किञ्चिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तव: ।
न वातजं भयं किञ्चिन्नापि ज्वरकृतं तथा ।।1.1.92।।
न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा ।

नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ।।1.1.93।।
नित्यं प्रमुदितास्सर्वे यथा कृतयुगे तथा ।

अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकै: ।।1.1.94।।
गवां कोट्ययुतं दत्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।
असंख्येयं धनं दत्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशा: ।।1.1.95।।

 

 

 

 

 

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