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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस संवत् २०७८ पर जानें वह योगाभ्यास जिसे राजा रामचन्द्र जी स्वयं करते थे।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस संवत् २०७८ पर जानें वह योगाभ्यास जिसे राजा रामचन्द्र जी स्वयं करते थे।

राजा रामचन्द्र की जय।

पूरी दुनिया प्राचीन सनातन विद्या योग से लाभ प्राप्त कर रही है। इसी क्रम में आज अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर उन प्राचीन महापुरषों के विषय में जानना चाहिए जिन्होंने अपने जीवन में योग के अभ्यास से अपने को पूरी तरह रूपांतरित किया और पूरे विश्व के कल्याण के लिए अपने पुरुषार्थ से जो कुछ किया उसके बाद दुनिया ने उनका परमात्मा स्वरूप स्वीकार किया।

जी हाँ आज हम राजा रामचन्द्र जी के योग के विषय में जानेंगे।

राजा रामचन्द्र जी कौन सी योग व ध्यान इत्यादि की प्रक्रिया अपनाते थे?
इसे जानने के लिए आपको योग वशिष्ठ (महा रामायण) पढ़ना पड़ेगा। इसकी रचना स्वयं भगवान वाल्मीकि जी ने की है। योग वशिष्ठ के उपशम प्रकरण के सर्ग ७८ में उस योग का वर्णन किया गया है, जिसका अभ्यास स्वयं भगवान राजा रामचन्द्र जी किया करते थे।

इसी कारण राजा रामचन्द्र को तपस्वी राजा की संज्ञा प्राप्त है और उन्हें सभी राजाओं में बड़ा माना जाता है। उनकी राज्य प्रणाली पूरे विश्व के लिए एक आदर्श है।

आईए अब हम जानते हैं की राजा रामचन्द्र जी कौन से योग को करते थे-

श्री रामचन्द्र जी के कुल गुरु श्री वसिष्ठ जी कहते हैं, कि चित के विनाश के लिए दो मार्ग दिखाए गए हैं-
१. योग २. ज्ञान

श्री राम पूछते हैं – गुरुदेव प्राण और अपान के निरोधरूप योग नाम की किस युक्ति से और कब मन अनंत सुख को देने वाली परम शांति को प्राप्त करता है।

जैसे जल पृथ्वी में चारों ओर से प्रवेश करके व्याप्त है, उसी प्रकार शरीर में विद्यमान असंख्य नाड़ियों में वायु चारों ओर से प्रवेश करके व्याप्त है। इसे ही प्राण, अपान, व्यान, उदान व समान वायु नाम से विभक्त किया गया है।

जैसे सुगंध का आधार पुष्प है वैसे ही चित्त का आधार यह प्राण है। प्राण के स्पंदन से चित्त का स्पंदन होता है। चित्त के स्पंदन से ही पदार्थों की अनुभूति होती है।

चित्त का स्पंदन – प्राण स्पंदन के अधीन है। अतः प्राण का निरोध करने पर मन अवश्य उपशांत(निरुद्ध) हो जाता है। यह बात वेद शास्त्रों को जानने वाले विद्वान कहते हैं।

मन के संकल्प का अभाव हो जाने पर यह संसार विलीन हो जाता है।

श्री रामचन्द्र जी पूछते हैं-

इस शरीर में स्थित हृदय आदि स्थानों में नाड़ी रूपी छिद्रों में संचरण करने वाले तथा निरंतर गमनागमनशील प्राण आदि वायुओं का स्पंदन कैसे रोका जा सकता है।

श्री वशिष्ट जी कहते हैं –
शास्त्रों का अध्ययन, सत्पुरुषों के सङ्ग्, वैराग्य, अभ्यास से सांसारिक दृश्य पदार्थों में सत्ता का अभाव समझ लेने, चिरकाल पर्यंत अपने इष्टदेव के ध्यान से, एक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थिति के लिए तीव्र अभ्यास से प्राणों का स्पंदन निरुद्ध हो जाता है।

रेचक, पूरक और कुम्भक आदि प्राणायामों के दृढ़ अभ्यास, एकांत ध्यानयोग से प्राणवायु निरुद्ध हो जाता है।

ॐकार का उच्चारण और ॐकार के अर्थ का चिंतन करने से बाह्य विषयों के ज्ञान का अभाव हो जाता है।

फिर प्राणों का स्पंदन रुक जाता है।

रेचक – श्वास छोड़ने की प्रक्रिया को ही रेचक कहते हैं।

कुम्भक – कुम्भक भी दो प्रकार का होता है- आन्तरिक कुम्भक और वाह्य कुम्भक।

आन्तरिक कुम्भक- इसके अन्तर्गत नाक के छिद्रों से वायु को अन्दर खींचकर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना सम्भव हो, उतनी देर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ दिया जाता है।

 

वाह्य कुम्भक – इसके अन्तर्गत वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना सम्भव हो, रोककर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को अन्दर खींचा लिया जाता है।

पूरक – श्वास लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं।

रेचक प्राणायाम का दृढ़ करने से विशाल प्राणवायु के बाह्य आकाश में स्थित हो जाने पर नासिका के छिद्रों को जब प्राणवायु स्पर्श नहीं करता, तब प्राणवायु का स्पंदन रुक जाता है। (इसी को बाह्य कुम्भक कहते हैं)

पूरक का दृढ़ अभ्यास करते करते पर्वत पर मेघों की तरह हृदय में प्राणों के स्थित हो जाने पर जब प्राणों का संचार शांत हो जाता है, तब प्राण स्पंदन रुक जाता है।
(इसी का नाम आभ्यंतर या आंतरिक कुम्भक है)

कुम्भ की तरह कुम्भक प्राणायाम के अनंतकाल तक स्थिर होने पर और अभ्यास से प्राण निश्चल स्तंभन हो जाने पर प्राणवायु के स्पंदन का निरोध हो जाता है।
इसी का नाम स्तंभवृत्ती प्राणायाम है।

पतंजलि द्वारा वर्णन-
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः। अर्थात आसान सिद्ध होने बाद श्वास प्रश्वास की गति का रुक जाना “प्राणायाम” है।

जिह्वा के द्वारा तालु के मध्य भाग में रहने वाली घटिका को प्रयत्नपूर्वक स्पर्श करने से जब प्राण ऊर्ध्वरंध्र में प्रविष्ट हो जाता है, तब प्राणवायु का स्पंदन निरुद्ध हो जाता है।

समस्त संकल्पों विकल्पों से रहित होने पर कोई भी नाम रूप नहीं रह जाता है, तब अत्यंत सूक्ष्म चिन्मय आकाश रूप परमात्मा के ध्यान से बाह्याभ्यंतर सारे विषयों के विलीन हो जाने पर प्राणवायु का स्पंदन निरुद्ध हो जाता है।

नासिका के अग्रभाग से लेकर बारह अंगुल पर्यंत निर्मल आकाश भाग में नेत्रों की लक्ष्य भूत संवित्दृष्टि (वृत्ती ज्ञान) को रोकने से प्राण का स्पंदन रुक जाता है।

ईश्वर के अनुग्रह से तुरंत उत्पन्न हुए दृढ़ भूत तथा समस्त विकल्पों से रहित परमात्म ज्ञान के हो जाने पर प्राणों का स्पंदन रुक जाता है।

हृदय में स्थित एकमात्र चिन्मय आकाश स्वरूप परमात्मा के ज्ञान से विषय वासना के अभाव से और मन के द्वारा परमात्मा का निरंतर ध्यान करने से प्राणों का स्पंदन निरुद्ध हो जाता है।

श्री रामचन्द्र जी –
इस जगत में प्राणियों के उस हृदय का स्वरूप क्या है, जिसमें यह सब दर्पण में प्रतिबिंब की तरह स्फुरित होता है।

श्री वशिष्ठ जी –
प्राणियों के दो प्रकार के हृदय
१. उपादेय (जो परमात्मा ही अपने आप में नित्य स्थित है, वह उपादेय परमात्मा ही प्रधान हृदय है )
२. हेय (इस देह में वक्षः स्थल के भीतर शरीर के एक देश में स्थित जो हृदय है उसे हेय हृदय जानों)

श्री राम चेतन परमात्मा ही सभी प्राणियों का हृदय कहा जाता है, जड़ और जीर्ण पत्थर के सदृश्य देह के अवयव का मांस-खंड रूप एक वास्तविक हृदय नहीं है।

वास्तव में जगत है ही नहीं, प्रत्युत वह परमात्मा स्वयं ही अपने-आप में स्थित है। जिसका अन्तः करण समस्त व्यवहारों में हर्ष और विषाद से रहित तथा सम हो गया है,
एवं जिसका मन शांत हो चुका है, वह महात्मा सब पुरुषों में श्रेष्ठ है। (सर्ग ७८ से उद्धृत)

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जय श्री राम।

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